राजीव वर्मा
कैसे कटा 1991 से 2024
तक का यह सफ़र,
पता ही नहीं चला ।
क्या पाया, क्या खोया,
पता ही नहीं चला !
बीती जवानी
आया बुढ़ापा,
पता ही नहीं चला ।
कल बेटा थे,
कब ससुर बन गये,
पता ही नहीं चला !
कब पिता से
नाना बन गये,
पता ही नहीं चला ।
कोई कहता बुड्ढा,
तो कोई कहता पापा,
क्या सच है,
पता ही नहीं चला !
पहले माँ बाप की चली,
फिर पत्नी की चली चाल,
फिर चली बच्चों की,
अपनी कब चली,
पता ही नहीं चला !
पत्नी कहती
अब तो समझदार हो जाओ,
क्या समझूँ,
क्या न समझूँ,
पता ही नहीं चला !
दिल कहता जवान हूँ मैं,
उम्र कहती बुजुर्ग हूं मैं,
इस चक्कर में कब,
घुटनें घिस गये,
पता ही नहीं चला !
सफेद हो गये बाल,
लटक गये गाल,
कब बदली सूरत और चाल
पता ही नहीं चला !
समय बदला,
मैं बदला
बदल गये मित्र-मंडली
कितने छूट गये,
कितनी रह गये
पता ही नही चला
कल तक मस्ती करते थे
कब सीनियर सिटिज़न बन गये,
पता ही नहीं चला !
नाती, पोते, की खुशियाँ आई,
कब मुस्कुराई उदास ज़िन्दगी,
पता ही नहीं चला ।
जी भर के जी लो प्यारे
फिर न कहना कि कब आ गयी मौत
मुझे पता ही नहीं चला